छुपी हुई जंग कृत्रिम जानकारी और असली खोज के बीच जो हमारे मन और आज़ादी को आकार देती है
हर इंसान के मन के भीतर एक अदृश्य खींचतान चल रही है। एक तरफ़ है बनावटी जानकारी जो पहले से छांटी हुई जानकारी है और जिसे ख़ास उद्देश्यों के लिए तैयार किया जाता है। दूसरी तरफ़ है खोज जो इंसान की प्राकृतिक और स्वाभाविक सोच का रास्ता है। इन दोनों के फ़र्क़ को समझना असली आज़ादी पाने की दिशा में सबसे बड़ा क़दम है।
कृत्रिम जानकारी और आज़ाद विचार का भ्रम
बनावटी जानकारी मन को नियंत्रित करने का बेहद मज़बूत साधन है। यह पहले से छांटी हुई जानकारी होती है जिसे व्यक्ति समूह या कॉरपोरेट अपने उद्देश्यों के हिसाब से तैयार करते हैं ताकि लोगों के फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। ये फ़ैसले किसी सेवा या उत्पाद को ख़रीदने से लेकर राजनीतिक निर्णयों तक हो सकते हैं या फिर ऐसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए जिनसे स्थापित व्यवस्था को चुनौती मिलती है।
इस व्यवस्था की नींव इस बात पर टिकी है कि लोग यह मानते रहें कि उनके निर्णय पूरी तरह उनके अपने हैं जबकि वास्तव में वे प्रभावित होते हैं। आज़ादी का भ्रम इस व्यवस्था को चलाए रखने का सबसे बड़ा हथियार है।
खोज मानव सोच का प्राकृतिक मार्ग
खोज बिल्कुल अलग है। यह इंसान की जीवन स्थितियों से पैदा होता है। यह मनुष्य को स्वाभाविक रूप से सोचने देता है जिससे निर्णय मौलिक और रचनात्मक होते हैं। यह निर्णय किसी बनाई हुई जानकारी पर आधारित नहीं बल्कि अपनी खोज और अपने अनुभवों पर आधारित होते हैं। यहां ध्यान उन्हीं समाधानों पर होता है जो सच में व्यक्ति की भलाई करते हैं।
कैसे मानव मन बन जाता है चालाकीपूर्ण जानकारी का चरागाह
लोग आसानी से चालाकीपूर्ण जानकारी के शिकार बन जाते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि उनके निर्णय पूरी तरह उनकी स्वतंत्र इच्छा पर आधारित हैं। लेकिन इसके पीछे कुछ गहरे कारण भी हैं।
जैविक कारण
मनुष्य जैविक रूप से असुरक्षित होता है क्योंकि रहने की प्रवृत्ति उसे दो इच्छाएं देती है स्वीकार किए जाने की इच्छा और समाज बनाने के लिए विचार साझा करने की इच्छा। आधुनिक समय का शब्द फोमो इसी जैविक कमज़ोरी का फ़ायदा उठाता है। पूरी बाज़ार व्यवस्था इन्हीं इच्छाओं के शोषण पर आधारित है और मनुष्य को लगातार उपभोग की ओर धकेलती है।
सामाजिक कारण
किसी जानकारी पर जितने अधिक लोग सहमत होते जाते हैं उसकी पहुंच उतनी बढ़ जाती है। यह गुणा प्रभाव पैदा करता है जिससे लोकप्रियता को ही सत्य मान लिया जाता है। ऐसा ही व्यवहार वहम में देखा जाता है। भले ही कोई बात अव्यवहारिक हो लेकिन यदि बहुत से लोग उसे मानने लगें तो समाज उसे सही मान लेता है। इस प्रकार स्वीकार्यता और फोमो मिलकर बनावटी जानकारी को तेज़ी से फैलाने का औज़ार बन जाते हैं।
स्कूल समाज और प्राधिकरण की भूमिका
इस तरह की जानकारी उन लोगों पर अत्यधिक असर करती है जिन्हें स्कूल व्यवस्था ने पहले ही इस तरह ढाला है कि वे आज्ञाकारी मज़दूर बनकर रहें। समाज उन्हें प्रश्न पूछने के बजाय बस पालन करना सिखाता है। क़ानून उन्हें आज्ञापालन के लिए तैयार करता है। ये सभी संरचनाएं मन पर छाप छोड़ती हैं और व्यक्ति को सरकार और अफ़सरशाही के आगे झुकने की आदत डाल देती हैं।
ऐसे जीवन के नुक़सान
मनुष्य कभी उपभोक्ता बनने के लिए नहीं पैदा हुआ। असली विकास खोज, प्रश्न, प्रयोग और सच्ची स्वतंत्र इच्छा से हुआ था। लेकिन आज अधिकांश लोग पहले कमाई करते हैं ताकि भोजन खरीद सकें। धरती पर केवल इंसान ही ऐसा एक जानवर है जो पहले पैसा कमाता है और फिर भोजन ख़रीदता है। इससे एक ऐसी दुनिया बन गई है जहां मनुष्य ज़ंजीरों से नहीं बल्कि कॉरपोरेट पर निर्भरता के कारण ग़ुलाम बनता जा रहा है। यह जनसमूह की ग़ुलामी है जो बहुत व्यवस्थित तरीक़े से चलाई जा रही है। आज़ाद ख़्याल का भ्रम मन पर क़ब्ज़ा किए बैठा है और लोग भूल गए हैं कि वे जीने के लिए पैदा हुए थे न कि केवल जीविका कमाने के लिए।
व्यक्तिगत स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता
वास्तविक बदलाव व्यक्तिगत स्तर से शुरू होता है। कुछ मूलभूत क़दम हमें वापस मानवता की ओर ले जाते हैं।
सबसे पहले जीवन की गति को धीमा करना होगा। जीवन को प्रकृति की ताल के साथ जोड़ना होगा।
ख़रीदारी की आदतों को सुधारना होगा। याद रखें कि पूरी प्रणाली केवल इसी पर चलती है कि लोग लगातार सामान सेवाएं और मनोरंजन ख़रीदते रहें। अनावश्यक ख़र्च को कम करें। कम वस्तुओं पर आधारित सरल और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं।
मन को पोषण देने वाली जानकारी से भरें। ख़ूब पढ़ें, पुस्तकालय जाएं, सार्थक चर्चा करें। विज्ञापनों से दूरी बनाएं। ऐसी जानकारियों को हटाएं जो मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाती हों।
अपने दादा दादी की तरह जीवन जीएं। प्रकृति के क़रीब रहें धीमे जीवन का अभ्यास करें और स्थानीय ताज़ा भोजन खाएं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछें। शिक्षा व्यवस्था ग्रेडिंग व्यवस्था, अमीर और गरीब की खाई, विकास की असल परिभाषा, हर उस प्राधिकरण को चुनौती दें जो सीधे या परोक्ष रूप से मनुष्यों को ग़ुलाम बनाने की कोशिश करता है।
बनावटी जानकारी और खोज के बीच की यह जंग हमारे समय का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष है। असली आज़ादी उसी क्षण शुरू होती है जब कोई व्यक्ति बनावटी जानकारी के बजाय खोज को, भ्रम के बजाय जागरूकता को और सुविधा के बजाय सत्य को चुनता है। यही असली मानव जीवन की ओर लौटने का मार्ग है।
