आधुनिक विवाह संकट
आधुनिक समय में विवाह व्यवस्था अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। यदि यह संस्था आगे चलकर टिकनी है तो इसे कई मूलभूत बदलावों की आवश्यकता है। कभी जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाने वाली शादी अब पहले जैसी सम्मानजनक या आवश्यक नहीं रही। तलाक़ के बढ़ते मामले, विवाह न करने की बढ़ती प्रवृत्ति, परंपरागत व्यवस्था में जीवन साथी खोजने में कठिनाइयां, जहेज़ और घरेलू हिंसा की बढ़ती घटनाएं, क़ानूनी दुरुपयोग, ना-जाएज़ संबंध, महंगी शादियां और आत्महत्याओं जैसी अनेक समस्याएं इस संकट को और गहरा करती जा रही हैं।
आर्थिक स्थिति में बदलाव
आज के समय में अधिक से अधिक महिलाएं रोज़गार में हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद वे अधिक सक्षम और सशक्त हुईं और उन्होंने अपने अधिकारों का उपयोग करना शुरू किया।इससे घरेलू हिंसा और जहेज़ जैसे मामलों की संख्या अधिक दर्ज होने लगी जो पहले रिपोर्ट भी नहीं होती थी।
पितृसत्तात्मक समाज में समानता की मांग कई रिश्तों में तनाव उत्पन्न करती है और अस्वस्थ संबंधों का कारण बनकर अंततः तलाक़ की स्थिति तक पहुंचती है।
महिलाएं खाना बनाती रही हैं जीववैज्ञानिक रूप से वे अधिक धैर्यवान और समायोजित हैं, कमी केवल आर्थिक स्वतंत्रता की थी जो अब नहीं रही इसलिए एक सशक्त महिला कई मामलों में पुरुषों से अधिक मज़बूत हो गई है।
मनोवैज्ञानिक बदलाव
स्त्रियों में कमाने, बाहर निकलने और काम करने का अत्यधिक उत्साह देखा जा सकता है। सदियों तक रोक दिए जाने के बाद यह पहली बार है कि उन्हें खुलकर आगे बढ़ने का अवसर मिला है और वे ख़ुद को साबित करने के लिए अत्यंत प्रेरित हैं।
वहीं दूसरी ओर पुरुष इसके बिल्कुल विपरीत महसूस करते दिखते हैं। कई पुरुष पारंपरिक रूप से महिलाओं के काम जैसे खाना बनाना और बच्चों की देखभाल में आनंद लेते पाए जा रहे हैं। भूमिकाओं का यह बदलाव अभी सामान्य नहीं है लेकिन तेज़ी से बढ़ रहा है।
कॉरपोरेट संस्कृति और पारिवारिक संस्कृति का प्रभाव
बहुत से उच्च आय वाले लोग शादी से दूरी बना रहे हैं और यदि शादी करते भी हैं तो बच्चों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते।मनुष्य सबसे पहले मानसिक शांति चाहता है। विवाह प्रणाली की कमज़ोरियों को खुलते हुए देख लोग जोखिम लेने से भयभीत हैं। शारीरिक संबंधों की उपलब्धता अन्य माध्यमों से भी संभव होने के कारण बहुत से लोग जीवनभर अविवाहित रहना चुन रहे हैं।
कुछ लोग बच्चों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते
कुछ के लिए आर्थिक कारण बाधा बनते हैं
कुछ इसे केवल व्यक्तिगत पसंद मानते हैं
न्यूक्लियर परिवार यानी एकल परिवार भी इस बदलाव का एक बड़ा कारण है
आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कई लोग लगातार थकान, हार्मोनल असंतुलन, मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में बच्चे पैदा करना और उन्हें पालना कई लोगों को शारीरिक तथा मानसिक रूप से एक अतिरिक्त बोझ जैसा लगता है।
शहरी और ग्रामीण विवाह में अंतर
शहरी क्षेत्रों में महिलाएं अधिक सशक्त हैं अपने अधिकारों से अधिक परिचित हैं और उनका उपयोग भी करती हैं इसलिए तलाक़ के मामले अधिक सामने आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग है। ग्रामीण महिला परिवार की रीढ़ होती है लेकिन जोखिम भी सबसे अधिक इन्हीं पर होता है। वे बच्चों, घर, पशुधन और खेती सब संभालती हैं।
कुछ मुद्दे जिन्हें सुलझाना आवश्यक है
सदियों की उत्पीड़नपूर्ण व्यवस्था और महिलाओं पर हुए अत्याचारों के कारण यह स्वाभाविक है कि कुछ महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अधिक सतर्क या अत्यधिक संवेदनशील हैं। इसी कारण कुछ मामलों में क़ानूनी दुरुपयोग भी देखा जा सकता है लेकिन कुल मिलाकर महिलाएं अब भी असुरक्षित हैं।
महिलाओं की ऐतिहासिक कमज़ोरी को देखते हुए क़ानूनी व्यवस्था दुनिया के लगभग हर देश में महिलाओं की ओर थोड़ा झुकाव रखती है। लेकिन जब क़ानूनी दुरुपयोग वास्तविक और गंभीर होने लगे तब इस असंतुलन को संबोधित करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे बहुत से मामलों में देखा जा रहा है।
यह सकारात्मक है कि विवाह संस्था बड़े परिवर्तनों से गुज़र रही है क्योंकि यह व्यवस्था लंबे समय से पुरुष केंद्रित थी और महिलाओं का भी इसे ऐसा होने में समान योगदान था। अब शक्ति संतुलन में धीरे धीरे परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
इन सब बातों के बावजूद इसमें कोई दो राय नहीं कि मानव विविधता इतनी व्यापक है कि सभी समस्याओं और कारणों को श्रेणीबद्ध करना या एक जैसा नहीं समझा जा सकता। हर रिश्ता अलग है और हर परिस्थिति अनूठी।
तलाक़, क़ानूनी दुरुपयोग, ना-जाएज़ संबंध और अनेक सामाजिक बदलावों के बावजूद ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले तीस से चालीस सालों में यह संस्था एक संतुलित धरातल पर पहुंच जाएगी और विवाह प्रणाली अपने नए रूप में फिर से स्थिर हो जाएगी।
